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Saturday, 25 March 2017

कनॉट प्लेस पे और बकवास

आपके संदेशों का सिलसिला थम नहीं रहा. सब कह रहे हैं कि मज़ा आ रहा है अपनी वाली हिंदी पढ़ के. सच कहूं तो मुझे भी हिंदी में लिख के अच्छा लग रहा है. हिंदी में सचमुच ज्यादा कहने को है और दुर्भाग्यवश अच्छे चिट्ठों के अभाव में कम पढने को है. इस अंतर का फायदा मुझ जैसे औसत दर्जे के चिट्ठा लेखकों को हो रहा है. आइये अपनी कनॉट प्लेस वाली चर्चा को जारी रखें.
यहाँ एक पुराना सिनेमा हाल हुआ करता था - रीगल सिनेमा. अब ये बंद हो रहा है. कभी अन्दर गया नहीं पर दुःख है मुझे भी. पुराना सिनेमा हॉल देख के लगता है की अगर कभी इंसानियत वाली कीमतों पे फिल्म देखने का मन हुआ तो कम से कम दिलासा तो है की यहाँ जा के देख सकते हैं. सारे पुराने टाकीज़ वाले भाई भाई लगते है. फिर चाहे वो जयपुर का राजमंदिर हो, ग्वालियर का हरिनिर्मल हो या फिर चंडीगढ़ का नीलम टाकीज़ हो. चलो कोई बात नहीं.
अगर आप कनॉट प्लेस से जनपथ रोड पकड़ लेंगे तो रास्ते में एक दक्षिण भारतीय रेस्तरां आएगा जिसका नाम है सरवणा भवन. यहाँ पर लोग कतार में लगे होंगे आतुर निगाहों से अन्दर झांकते. एक महिला जो मुस्कुरा नहीं रहीं होंगी, वो इनके सबके नाम पर्ची पे लिख के एक एक कर के इन्हें अन्दर भेज रही होंगी. जैसे जैसे मेज खाली होती जाएंगी, ये लोगों को अन्दर भेजती जाएंगी. लोग खड़े रहेंगे तमीज से, अपनी बारी का इंतज़ार करते. आप सोचेंगे के दस ठो दक्षिण भारतीय भोजनालय होंगे आस पास, फिर इतनी भीड़ और मारामारी क्यूँ? तो जवाब ये है कि यहाँ की गुणवत्ता अच्छी है. स्पष्ट रूप से यही कारण हो सकता था. और ये भी है की अन्य दक्षिण भारतीय भोजनालय थोड़े राम भरोसे किस्म के भी हैं. बाबा खड़क सिंह मार्ग पे जो अपना इंडियन कॉफ़ी हॉउस है उसमे बैठने को जगह नहीं मिलती और अगर मिल भी जाये तो वेटर नहीं आता. और अगर आपकी मेज खुले में है तो ऐसा भी हो सकता है की बन्दर आ के आप पे आक्रमण कर दे. मजाक नहीं कर रहा हूँ, भोजनालय में बन्दर हैं. अरे, आपको मजाक लग रहा है.
और एक और भोजनालय है जिसका नाम है मद्रास कैफ़े. जितना खूबसूरत नाम है, खाना उतना ही वाहियात. ये काफी पुराना रेस्तरां है तो अब शायद इन्हें गुरूर हो गया है. घोल को तवे पे डाल के, छिस्स्स की आवाज़ होते ही शायद ये शायद समझ लेते हैं कि डोसा बन गया. आप शिकायत करेंगे तो आपको ही समझा देंगे कि ऑथेंटिक डोसा ऐसा ही होता है और आपको ही शायद स्वाद का ज्ञान नहीं है. पहले अपना मुंह हमारे डोसे के लायक करिए, फिर आइयेगा.
तो इसलिए शायद हर व्यक्ति जिसका मुंह मद्रास कैफ़े के डोसे के लायक नहीं है या जिसे अपना मुंह बन्दर से नहीं कटवाना, वो सरवणा भवन आ जाता है. अरे हां, ये शाकाहारी जगह है. अगर दंद-फंद खाना है तो आन्ध्रा भवन की बिरयानी और केरल भवन की मछली का भी कोई जोड़ नहीं है.
जनपथ पे और थोडा आगे चलेंगे तो खूबसूरत कारीगरी के काम देखने मिलेंगे. आपके लिए नहीं हैं, ये विदेशी पर्यटकों को थोड़ा लपेटे में लेने वाली चीज़ें हैं. आप आगे बढ़ते रहिये. हाँ, यहाँ हथकरघा उद्योगों और अन्य कलाओं की प्रदर्शनी लगती है, साड़ियाँ, शाल वाले आते हैं. वहां एक चक्कर मार सकते हैं अगर कुछ अच्छा लग जाये तो ले भी सकते हैं. पर एक विशेष चेतावनी, अगर आपके पास समय कम है, और मम्मी को ले के आये हैं तो चुपचाप चलते रहिये. अगर मम्मी ने ये दुकानें देख लीं तो हर दुकान पे चार चार घंटा लगेगा, हर साड़ी खुलेगी- और ये सब कहा जाएगा कि इसमें दूसरा रंग दिखाना, इसमें पैटर्न दूसरा नहीं है? और दूसरी कोई दिखाओ जिसमे ये मोर बने हों... फलाना ढिकाना. लेना देना चाहे धेला न हो.
जनपथ मार्किट में घुस जाएँगे तो नज़ारा बदल जाएगा. क्राफ्ट मार्किट में जहाँ बारीकी से नक्काशे हुए नमूने थे, यहाँ पे लोग नमूने हैं. कपड़ो की ढेरी लगी है, हर माल दो सौ रुपया. लोग अपनी पसंद के कपडे छांट रहे हैं और थोक में ले रहे हैं. बीच सड़क पे लड़कियां मुंह से चोंच बना के सेल्फी ले रही हैं. और कोई संदिग्ध सा आदमी थोड़ी आनाकानी के बाद चार हज़ार के रे बेन के चश्में चार सौ में दे रहा है. यहाँ के कपडे सस्ते इसलिए हैं कि फैशन के इस दौर में गारंटी कैसी? बस एकाध महीना पहन के फेंको फांको. है कि नहीं? दिल्ली जवांदिल लोगों का शहर है और जवां दिल किसी एक पे नहीं टिकता. इस लिए इस मार्किट में सबसे ज्यादा रौनक है.
रौनक तो पालिका बाज़ार में भी है जिसे अपन पीछे छोड़ आए थे. कनॉट प्लेस के तलघर में एक अंडरग्राउंड टाइप मार्किट है. इसमें हर चीज़ की बोली लगती है. उल्टी बोली. वो बोलेगा दस हज़ार, आप बोलोगे दस रुपया. वो बोलेगा मजाक कर रहे हो बेंचो, आप बोलोगे शुरू किसने किया बेंचो. फिर आप बोलोगे की चू समझा है क्या, मैं भी लोकल ही हूँ. फिर वो बोलेगा अच्छा पांच हज़ार लाओ. फिर आप बोलोगे रैन दो. फिर आप जाने लगोगे तो वो हाथ पकड़ लेगा. ना जाओ सैंया. फिर आप बोलोगे ठीक ठीक लगाओ तो वो बोलेगा लाओ चार सौ दे दो. आप ले तो लोगे पर मन में यही रहेगा कि स्साला ठग तो नहीं गए?
कनॉट प्लेस पे चर्चा ख़त्म ही नहीं हो रही. अगले चिट्ठे में और बात करते हैं. अपने सन्देश और गालियाँ भेजते रहिये.

कनॉट प्लेस पे बकवास

सबने कहा कि हिंदी में ज्यादा लिखा करोइतना साधुवाद मिला कि मन को अपार प्रसन्नता टाइप हो गयीइसलिए जब तक विचार आते जा रहे हैंहम सोच रहे हैं की ज्यादा से ज्यादा अपने चिट्ठे में उड़ेल लें.
एक जगह है दिल्ली में कनॉट प्लेसनाम तो सुना होगायहाँ पर बीचों बीच एक पार्क है जिसको कहते हैं सेंट्रल पार्क और वहां जिस दिन आपको मन होता है अन्दर जाने काये उसी दिन देख रेख के लिए बंद होता हैबाहर से घुमते हुए आप प्रेमी युगलों को भांति भांति की मुद्राओं में देख के शर्मसार हो सकते हैंअधिकतर जोड़ों में मादा रूठी बैठी होती है और नर उसको मना रहा होता हैहर जोड़े में नर का चेहरा देख लीजिये वही कातर निगाहेंवही दयनीय मुस्कानये प्रेमी युवक भी एक अलग ही प्रजाति होती है.
सेंट्रल पार्क के चारों तरफ बाज़ार हैगोलाकार नक्शा है इसलिए आप खो नहीं सकते अगर आप अंग्रेज़ नहीं हैं तोहर बार जब मैं जाता हूँएक न एक विदेशी नक्शा ले के रास्ता पूछता मिल जाता हैपक्का चबूतरा बना है पूरे बाज़ार मेंऔर चिकने चबूतरे के फर्श पे बैठे हैं लोग मोबाइल कवरबैगचूड़ियाँशू पोलिश ले केअंग्रेजों को देखते ही हर माल की कीमत तिगुनी हो जाती हैडॉलर की शक्ति की महिमा है भैयाफिर चाहे गोरा किसी गरीब यूनान सरीखे मुल्क का ही क्यूँ न होहम तो महंगा ही बेचेंगेआपकी चमड़ी गोरी है तो आपकी झंझट है.
गोरों को देख के मेरा मन बहुत करता है मदद करने काभारतीय स्वागत संस्कृति दिखाने कापता नहीं अफ्रीकन लोगों को देख के ये संस्कृति कहाँ चली जाती हैनस्लवाद हमारे देश के खून में दौड़ता है.
इस बाज़ार में बहुत सारी दुकानें हैं और सब मशहूर एक से बढ़कर एकएक बेकरी है वेन्गर्सयहाँ पे पता नहीं चलता पर्ची कहाँ कटानी हैपेस्ट्री कहाँ से लेना हैपैसे कहाँ देने हैंअन्दर जा के एक काउंटर से दुसरे काउंटर का रास्ता पूछना पड़ता हैपर अगर आपने किसी तरफ मोटे अंकल को धकेल केछोटे बच्चे को अलग कर केभीड़ को गच्चा दे केकिसी तरह पेस्ट्री या पैटी या कुछ भी हासिल कर लिया तो समझ लीजिये की आपकी ज़िन्दगी मुकम्मल हैमाल साधारण भी हो तो भी वेंगर्स का है इसलिए अच्छा है.
आगे चल के एक मिल्कशेक की दुकान हैअब दूध तो दूध है भाईइसमें क्या ख़ास होगा पर नहींदिल्लीवालों से मत कह दीजियेगायहाँ पे लाइन लगा के पचास रूपए का दूध पीते हैं एक गिलास बिना मलाई मार केफ्लेवर की बात है तुम क्या समझोगे गाँव का ताज़ा दूध पीने वाले.
और आगे चलेंगे तो पान वाला है एक ओडियन के सामनेओडियन क्या है ये मैं क्यूँ बताऊँतो इस पानवाले ने मुझे पहली बार चुस्की पान खिलाया थामुझे लगा शरीफों का शहर हैशराफत से खिला देगा पर यहीं तो हम मात खा गएचुस्की पान शराफत से खाया जाता है और न खिलाया जाता हैपान की पुंगी बना के उसमे बरफ भर के पानवाला आपसे आ करने को कहता हैआप आ करते हैं और ये नुकीला बर्फयुक्त पदार्थ वो आपके मुंह में ठूंस देता हैऔर ठूंसा तो ठीक पर साथ में वो आपको मुंह बंद रखने बोलता है ठुड्डी पे थपकी मार केमतलब ऐसे कौन खिलाता है भाई?
अगर बरफ से मुंह जम न गया हो तो आगे बढिएऔर भी बहुत दुकानें हैंसबके बारे में तो आज कहना मुश्किल हैइस चिट्ठे को आगे क्रमशः समझिये.

ऑटोरिक्शा पे बकवास

दिल्ली में नाइधर से उधर जाने के बड़े विकल्प हैंआप समझ नहीं पाएँगे के कौनसा तरीका अख्तियार करेंद्रुतगति से भागते हुए ऑटो को रोक कर दरख्वास्त करेंसाइकिल रिक्शा लेंमेट्रो लें या फिर फ़ोन निकाल के एप से टैक्सी बुलाएं और रौब से ऐसे बैठें जैसे ज़िन्दगी में कभी कार से नीचे कदम ही नहीं रखा होमेट्रो में जाने का आम आदमी का एक नुकसान ये है की मेट्रो के ए ऍफ़ सी गेट से जैसे ही आप अन्दर दाखिल होते हैंआप भारतीय नहीं रह जातेन आपका दीवार को गुटखे की पीक से रंगने का जी करता हैन ही आप पाउच और पन्नी यहाँ वहां गिराते चलते हैंअन्दर कूड़ेदान भी नहीं मिलेगा तब भी आप अपना कचरा साथ ले जाते हैंकुछ बहादुरबिरले वीर ही होते हैं जो मेट्रो को गन्दा करने की कुव्वत रखते हैंउन जवानों और बूढों को मेरा सलाम है.
साइकिल रिक्शा पे दिल्लीवाले दया कर के बैठते हैं कि गरीब का घर चल जाएगासाइकिल रिक्शा का ही विकसित पोकीमोन स्वरुप है ई-रिक्शाइसपे आप जान हथेली पर रख कर बैठ जाइएमाशा अल्लाह सस्ते दाम में और जल्द से जल्द आपको मंजिल पे दे पटकेगा.
ऑटो की शान में जितना कहूं उतना कम हैऑटो में इंसान बैठता नहींवक़्त और हालत उसे बैठाते हैंपहले तो आपको ऑटोवाले से मिन्नत करनी होती है वो अपनी मंजिल और आपकी मंजिल के एक कर लेकुछ बेवक़ूफ़ लोग मीटर से चलने बोल देते हैं और वो चल देता हैआपको पीछे छोड़ करदिल्ली में हैं तो ये मत कहिये कि भैया मीटर से चलोकहियेभैया मीटर से दस ऊपर ले लेनाये संवाद ऑटोवाले के लिए खुल जा सिमसिम सरीखा कोड होता है.
ऑटो को यातायात के नियमों में भी छूट मिली हुई हैआप कार लिए हैं तो लाल बत्ती पे रुकना होगापर यदि आप ऑटो में हैं तो कूद कर फुटपाथ पर चढ़ जाइये और वहां से ऑटो मोड़ कर बत्ती पे सब गाड़ियों के आगे ले आइयेसारी गाड़ियाँ मुंह बाए देखती रहेंगी आप सर घुमाइएअगर आस पास पुलिसवाला नहीं है तो द्रुत गति से निकाल दीजिये अपना ये अनोखा तिपहिया वाहन.
ऑटो में यदि आप महिला मित्र के साथ हैं तो सिग्नल पर रोमांस के काफी मौके उपलब्ध कराये जाते हैंएक बिखरे बाल लिए बच्चा आपको फूलों का दस्ता देगाकहेगा कि वो भगवान् से दुआ करेगा की आपकी जोड़ी सलामत रहेफिर चाहे आप बहन या सहेली के साथ ही क्यूँ न बैठे होंउसको मतलब गुलाब बेचने से हैआप ध्यान मत दीजिये तो वो आगे बढ़ जाएगाफिर आ जाएँगे कुछ और लोग ताली बजा बजा कर दुआ देतेआपने मांगी हो या न मांगी होदुआ मुफ्त मिलेगीऔर फिर मिलेगा मुफ्त ये डायलाग कि "अबे दे न चिकने!" ऑटो में ये सुविधा उपलब्ध हैकार में तो आप शीशा चढ़ा लेंगेऑटो में क्या चढ़ाएंगेऑटो में बैठना हो तो नियम कहता है की चलते ऑटो को रोकोरुका ऑटो अपने रुके होने का किराया भी आपसे वसूलेगापर ये कोई नहीं बताता की चलता ऑटो रोकने के लिए कुछ अर्हताएं होनी चाहिएपहले तो बुलंद आवाज़ जो एक बार चीखने पे ऑटो पट्ट से रुक जायेदूसरा धैर्य क्यूंकि ज़रूरी नहीं कि आप जहाँ जाइएगा वहां ऑटो को भी जाना होगाऑटो का अपना मन होता है.
दिल्ली के ऑटोवाले फिर भी शरीफ हैंबंगलौर में मैंने ऑटो लिया था जिसने मुझसे तीन किलोमीटर के पांच सौ रुपये लिए थेमंगलौर के ऑटोवाले तो ओला उबर वालों को मार मार के भुर्ता बना देते हैं की स्साले हमारी सवारी बिठाएगादिल्ली में ऐसी मार पिटाई का कोई रिवाज नहीं हैबहुत ज्यादा ऑटो हैं और कुछ का धंधा नहीं भी चलता पर शराफत से रहते हैंताकते हैं जब कोई ओला या उबर से निकल के कैशलेस पेमेंट करता हुआहोठों को गोल कर के सीटी बजाता हुआ निकल जाता हैहसरत भरी नज़र से वो उसे देखते हैं और मन ही मन सोचते होंगे के बेटा जिस दिन पेटीएम् में साढ़े तीन सौ रुपैया नहीं होगातब हम ही याद आएँगे.

Friday, 17 March 2017

The Perfect One

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This post is in collaboration with Millybridal UK


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 She had chosen her prince after years of deliberation. He wasn't the man who could just do a neat trick or tell a good joke. He was a man of her dreams. A man who could keep her happy for years and years. She had met many who tried to fit the bill but, she knew in her heart that there was someone else. Someone who wanted to make her smile. Not just make her smile, someone who wanted to see her smile and let the rest of the world dissolve in thin air.

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 So, she wanted their wedding to be perfect. She wanted to glow on that special day. Because she knew that this day and hereon, everything would be different. She wanted to be born again on her wedding day. She knew that a man who wanted her to follow him was not her man. A man who had no plan was not her man. She knew that her man was the one who stood tall and held her by the hand. A man who wanted to walk with her, by her side. A counsel, a companion and much more than a friend. For such a man, she wanted to dress up. She wanted to leave no stone unturned. There is nothing wrong with a small ceremony. It is the happiness of the heart that counts. And she was counting big on it.

A Dress

I want a dress,
that has the moon.
Over which,
he can swoon.

Be it a ball gown,
or empire waist.
All doubt shall
be put to rest.

I want you here,
I want you now.
On this altar,
I want a vow.

A vow that you,
will value this.
And seal it then,
with the sweetest kiss.

I need you to,
stay up late.
I need you to
become my fate.

On this day,
under the sun,
I want you to,
have some fun.

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Get off that chair,
and let's dance.
And let's begin
a lasting romance.

I want our story,
in one big book.
Ever since you came,
darlin' I've been shook.

And I want this
newness to last.
"Can we grow old?"
Not so fast.


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